NISAR ने 17 तस्वीरों में लावा फैलते पकड़ा—हर 12 दिन दो बार निगरानी

|लेखक: QUASA संपादकीय टीम|6 मिनट पढ़ने का समय| 1
NISAR ने 17 तस्वीरों में लावा फैलते पकड़ा—हर 12 दिन दो बार निगरानी

NASA ने 24 सितंबर 2026 को जारी विवरण में बताया कि भारत-अमेरिका के NISAR उपग्रह की 17 रडार तस्वीरों से रूस के कामचटका प्रायद्वीप पर Krasheninnikov ज्वालामुखी के फैलते लावा का समय-अंतराल बनाया गया; उपग्रह वहाँ हर 12 दिन में दो बार अवलोकन करता है। चुनी गई तस्वीरें 25 दिसंबर 2025 से 17 अगस्त 2026 तक की हैं। हर तस्वीर में एक पिक्सेल लगभग 10 गुणा 10 मीटर जमीन दर्शाता है।

चित्रों में उत्तरी क्रेटर से निकला लावा पहले भीतर की छोटी काल्डेरा को भरता, फिर बड़े क्रेटर से आगे पूर्व की ओर फैलता दिखाई देता है। इस क्रम के लिए रडार से मिले अलग-अलग समय के अवलोकन जोड़े गए हैं; यह लगातार रिकॉर्ड किया गया वीडियो नहीं है। NISAR विज्ञान दल के सदस्य और Cornell University के भूभौतिकविद मैथ्यू प्रिचर्ड की टिप्पणी, “The consistency is crucial.”, इंटरनेशनल बिज़नेस टाइम्स सिंगापुर की रिपोर्ट में दर्ज है। उनका आशय नियमित मापन से खतरे की निगरानी की संभावना से था।

तस्वीरों में लावा का रास्ता

समय-अंतराल में उत्तरी शंकु के भीतर लावा क्षेत्र धीरे-धीरे बड़ा होता है। वह छोटी, भीतरी काल्डेरा से निकलकर चौड़े क्रेटर तक पहुँचता है और उसके बाहर पंखे जैसी आकृति बना लेता है। इस बदलती सीमा को एक ही इलाके की अलग-अलग तस्वीरों में देखा जा सकता है। इसलिए क्रम केवल ज्वालामुखी की एक स्थिति नहीं दिखाता, बल्कि महीनों में उसकी सतह पर हुए बदलाव को दर्ज करता है।

चित्रों में उत्तर-पश्चिम की ओर एक दूसरा प्रवाह भी दिखाई देता है। उसके पहली उपलब्ध NISAR तस्वीर से पहले बनने की संभावना है, इसलिए इस दृश्य क्रम से उसके शुरू होने की तारीख नहीं निकाली जा सकती। पूर्व की ओर बढ़ता क्षेत्र मुख्य परिवर्तन है जिसे चुनी गई तस्वीरें समय के साथ दिखाती हैं। दोनों दिशाओं में दिखने वाले लावा को एक ही समय पर शुरू हुई गतिविधि मानने का आधार इन चित्रों में नहीं है।

Krasheninnikov दो ज्वालामुखीय शंकुओं वाला परिसर है, और प्रकाशित क्रम उत्तरी शंकु की गतिविधि दिखाता है। समय-अंतराल में कुछ क्षणों पर लावा की सीमा स्पष्ट होती है, लेकिन तस्वीरों के बीच क्या हुआ, उसका हर चरण रिकॉर्ड में मौजूद नहीं है। अगली तस्वीर में बड़ा दिखने वाला क्षेत्र पिछले गुजराव के बाद किसी भी समय बढ़ा हो सकता है। यही कारण है कि चित्र फैलाव का विश्वसनीय क्रम देते हैं, प्रवाह की हर पल की गति नहीं।

रडार में लावा हल्का क्यों दिखाई देता है

NISAR का रडार सामान्य रंगीन तस्वीर नहीं लेता। वह सतह की ओर सूक्ष्म तरंगों के संकेत भेजता है और लौटे संकेतों से चित्र बनाता है। इसके लिए सूर्य की रोशनी की जरूरत नहीं होती; सामान्य बादलों के बीच भी सतह का अवलोकन किया जा सकता है। कामचटका जैसे दूरस्थ इलाके में यह क्षमता बार-बार तुलनीय मापन पाने में मदद करती है, खासकर जब दृश्य प्रकाश वाली साफ तस्वीर उपलब्ध न हो।

इस दृश्य क्रम में लावा क्षेत्र आसपास की सतह से हल्का दिखता है क्योंकि उससे रडार संकेत अधिक चमकीले ढंग से लौटते हैं। आसपास की जमीन का रूप भी मौसम के साथ बदलता है: कहीं बर्फ रहती है, तो कहीं खुली सतह दिखाई देती है। इसलिए चित्र का हल्का रंग सीधे लावा का तापमान नहीं बताता। रंग और चमक को तापीय माप समझने से रडार चित्र का अर्थ बदल जाएगा।

पिक्सेल का जमीन पर दर्शाया गया आकार फैलाव की सीमा समझने में उपयोगी है। एक ही भूभाग के क्रमिक चित्र दिखाते हैं कि लावा ने क्रेटर के भीतर और बाहर कितनी जगह घेर ली, लेकिन उनसे हर छोटी दरार या लावा की मोटाई नहीं पढ़ी जा सकती। रडार के लौटे संकेत सतह के गुणों से भी प्रभावित होते हैं। इसीलिए शोधकर्ता किसी एक चमकीले हिस्से की जगह उसके स्थान, आकार और बाद की तस्वीरों में आए बदलाव को देखते हैं।

दो दिशाओं से अवलोकन का अर्थ

NISAR इस स्थान के ऊपर एक बार दक्षिण से उत्तर और फिर उत्तर से दक्षिण की ओर गुजरता है। ये अलग दिशाओं से मापन के अवसर हैं, जो बदलती सतह को दोहराकर देखने में मदद करते हैं। प्रकाशित समय-अंतराल के लिए उपलब्ध अवलोकनों में से कुछ तस्वीरें चुनी गई हैं; उसमें दिखाई गई तस्वीरों की संख्या को उस पूरी अवधि में हुए सभी गुजरावों की संख्या नहीं समझना चाहिए।

नियमित रडार अवलोकन का लाभ दूर स्थित ऐसे ज्वालामुखी पर खास तौर से स्पष्ट होता है जहाँ जमीन पर मापन सीमित है। एक तस्वीर लावा क्षेत्र की उस समय की सीमा दिखाती है; बाद की तुलनीय तस्वीरें बताती हैं कि वह सीमा कहाँ आगे बढ़ी। यह जानकारी बदलते भूभाग का रिकॉर्ड बनाने और दूसरी निगरानी सूचनाओं के साथ उसका संबंध समझने में काम आ सकती है। गुजरावों के बीच अचानक हुई घटना की तत्काल सूचना देने की गारंटी इस मापन चक्र से नहीं मिलती।

भारत की भूमिका इस उदाहरण में उपग्रह के निर्माण से जुड़ी है। भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन, ISRO, ने NISAR का मुख्य उपग्रह ढाँचा और एस-बैंड रडार दिया, जबकि NASA की ओर से एल-बैंड रडार और उसका परावर्तक उपलब्ध कराया गया। Krasheninnikov का प्रकाशित दृश्य क्रम एल-बैंड रडार के आँकड़ों से बना है। दोनों उपकरण अलग तरंगदैर्ध्य इस्तेमाल करते हैं, इसलिए इस खास चित्र क्रम को पूरे उपग्रह की हर मापन क्षमता का प्रदर्शन मानना सही नहीं होगा।

निगरानी में उपयोग और सितंबर की स्थिति

प्रकाशित समय-अंतराल अगस्त में समाप्त होता है, जबकि ज्वालामुखी की गतिविधि उसके बाद भी दर्ज हुई। Smithsonian और अमेरिकी भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण की 10–16 सितंबर 2026 की रिपोर्ट के अनुसार, 10–15 सितंबर को उत्तरी शंकु की पूर्वी ढलान पर लावा बहता रहा; उपग्रह चित्रों में प्रतिदिन बड़ी तापीय विसंगति दिखी और विमानन चेतावनी का रंग पीला रहा। यह बाद की गतिविधि का अलग रिकॉर्ड है, प्रकाशित NISAR क्रम की अतिरिक्त तस्वीर नहीं।

रडार में फैलते लावा क्षेत्र की आकृति और तापीय चित्र में गर्म क्षेत्र की पहचान अलग तरह की सूचनाएँ हैं। साथ देखने पर वे गतिविधि की अधिक ठोस तस्वीर दे सकती हैं, लेकिन एक को दूसरे का सीधा विकल्प नहीं माना जा सकता। रडार का बदलता दृश्य यह बताता है कि सतह कहाँ बदली है; उससे अगले विस्फोट का समय अपने-आप नहीं निकलता। खतरे का आकलन करने के लिए ज्वालामुखी की दूसरी उपलब्ध निगरानी सूचनाएँ भी जरूरी होती हैं।

अगली तुलनीय रडार तस्वीरों का महत्व अब पूर्वी ढलान पर दर्ज बाद के प्रवाह से जुड़ता है। उनसे पता चल सकेगा कि पहले से दिखाई दे रही लावा सीमा आगे किस दिशा में बदली और कौन-से बदलाव केवल दो गुजरावों के बीच हुए। दूरस्थ ज्वालामुखी पर ऐसी क्रमिक तस्वीरें निगरानी के लिए सतह का रिकॉर्ड जोड़ती हैं, जबकि तत्काल चेतावनी और विस्फोट के पूर्वानुमान के लिए अलग मापन तथा आकलन की जरूरत बनी रहती है।

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