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क्रिएटर अर्थव्यवस्था

भारत की क्रिएटर अर्थव्यवस्था की रिपोर्ट: गैर-मेट्रो शहरों में पहुँचा केंद्र

|लेखक: व्याचेस्लाव वासिपेनोक|6 मिनट पढ़ने का समय| 336
भारत की क्रिएटर अर्थव्यवस्था की रिपोर्ट: गैर-मेट्रो शहरों में पहुँचा केंद्र

भारत की क्रिएटर अर्थव्यवस्था पर नई रिपोर्ट का सीधा निष्कर्ष यह है कि इसका केंद्र अब केवल मुंबई, दिल्ली या बेंगलुरु जैसे महानगर नहीं हैं। 14 जुलाई 2026 को जारी ISB–HashFame की रिपोर्ट के अनुसार 2025 में भारत के कुल 4.12 मिलियन क्रिएटर में से 66% गैर-मेट्रो शहरों और कस्बों से थे। यह बदलाव केवल सोशल मीडिया पर नए लोगों की संख्या बढ़ने का मामला नहीं है; यह क्षेत्रीय भाषाओं, स्थानीय दर्शकों और ब्रांडों के लिए बदलते बाजार का संकेत है।

रिपोर्ट के साथ जुड़ी सबसे बड़ी सावधानी भी स्पष्ट है। 2020 से 2025 के बीच क्रिएटर आधार लगभग 0.96 मिलियन से बढ़कर 4.12 मिलियन हुआ, लेकिन अधिकांश क्रिएटर अब भी साल में केवल एक भुगतान वाला ब्रांड अभियान कर पाते हैं। इसलिए मौजूदा कहानी “कितने लोग क्रिएटर बन रहे हैं” से आगे बढ़कर यह पूछती है कि कितने लोग लगातार कमाई वाला काम बना पा रहे हैं।

14 जुलाई की रिपोर्ट ने क्या बदला

2020 से 2025 के बीच भारत में गैर-मेट्रो क्रिएटरों की हिस्सेदारी 44% से बढ़कर 66% होने का मानचित्रात्मक तुलना दृश्य

यह अध्ययन भारतीय प्रबंधन संस्थान नहीं, बल्कि Indian School of Business के Srini Raju Centre for IT and the Networked Economy और HashFame ने जारी किया है। इसके लिए Qoruz Creator Intelligence Platform के 2020–2025 के क्रिएटर, ब्रांड अभियान और दर्शक-भागीदारी संबंधी आंकड़ों का इस्तेमाल किया गया। मूल इंटरैक्टिव रिपोर्ट इसे केवल प्रभावशाली व्यक्तियों की सूची नहीं, बल्कि भागीदारी, मांग, व्यावसायिक संबंध और उत्पादकता को जोड़कर देखने वाला आर्थिक अध्ययन बताती है।

मुख्य बदलाव भौगोलिक है। 2020 में गैर-मेट्रो क्रिएटर कुल आधार का 44% थे, जबकि 2021 में उनका हिस्सा पहली बार आधे से अधिक हो गया। 2025 तक यह 66% पहुँच गया, यानी लगभग 2.72 मिलियन क्रिएटर महानगरों के बाहर स्थित थे। इसी अवधि में गैर-मेट्रो क्रिएटर आपूर्ति 6.4 गुना बढ़ी, जबकि महानगरीय बाजारों में वृद्धि 2.6 गुना रही।

इकोनॉमिक टाइम्स की स्वतंत्र रिपोर्टिंग भी इसी निष्कर्ष की पुष्टि करती है और बताती है कि गैर-मेट्रो क्रिएटरों की संख्या ब्रांड अभियानों में भाग लेने के मामले में लगभग 38,000 से बढ़कर 2025 में 408,000 से अधिक हुई। इसका अर्थ यह नहीं है कि हर नया क्रिएटर व्यावसायिक रूप से सफल हो गया; इसका अर्थ है कि ब्रांड गतिविधि का भौगोलिक आधार पहले की तुलना में काफी विस्तृत हुआ है।

वृद्धि के साथ दर्शकों की भागीदारी भी बढ़ी

इस रिपोर्ट का दूसरा महत्वपूर्ण निष्कर्ष यह है कि क्रिएटरों की संख्या बढ़ने से औसत दर्शक-भागीदारी कमजोर नहीं हुई। अध्ययन में पिछले 30 पोस्ट के आधार पर औसत भागीदारी दर 2020 के 1.8% से बढ़कर 2025 में 7.2% बताई गई है। रिपोर्ट के अनुसार यह गणना प्रति क्रिएटर औसत अनुयायियों की तुलना में मध्यिका पसंद और टिप्पणियों के अनुपात पर आधारित है।

यह आंकड़ा सावधानी से पढ़ना चाहिए। 7.2% की दर पूरे भारतीय इंटरनेट या हर मंच की औसत दर नहीं है; यह रिपोर्ट में इस्तेमाल किए गए क्रिएटर डेटाबेस और परिभाषा के भीतर का परिणाम है। फिर भी, इसका संपादकीय महत्व है: अधिक क्रिएटरों के आने के साथ दर्शक-संबंध पूरी तरह बिखरते नहीं दिखे। गैर-मेट्रो और क्षेत्रीय समुदायों में भाषा, स्थानीय संदर्भ और साझा रुचि ने भागीदारी को मजबूत करने में भूमिका निभाई हो सकती है, लेकिन इसे रिपोर्ट के आंकड़ों से आगे बढ़ाकर निश्चित कारण नहीं कहा जा सकता।

भाषा इस बदलाव का केंद्रीय हिस्सा है। हिंदी क्रिएटर कुल आधार का 42% हैं, जबकि तेलुगु, तमिल, कन्नड़, मराठी, बंगाली, मलयालम, गुजराती, भोजपुरी और अन्य क्षेत्रीय भाषाओं के क्रिएटर मिलकर बहुमत बनाते हैं। ETBrandEquity के विवरण के अनुसार यह स्थिति ब्रांडों को केवल बड़े नामों और राष्ट्रीय पहुंच पर निर्भर रहने के बजाय भाषा और समुदाय के आधार पर साझेदारी बनाने की ओर धकेल सकती है।

सबसे बड़ा अंतर: भागीदारी और आय के बीच

दो वार्षिक अभियानों वाले नैनो क्रिएटर और पाँच अभियानों वाले माइक्रो क्रिएटर की स्थानीय वेतन मानकों से आय तुलना

रिपोर्ट का सबसे उपयोगी और सबसे कम चमकदार निष्कर्ष कमाई से जुड़ा है। गैर-मेट्रो क्रिएटरों की संख्या भले तेज़ी से बढ़ी हो, लेकिन लगभग 85% गैर-मेट्रो क्रिएटर एक वर्ष में कोई अभियान पूरा नहीं करते। अभियान करने वालों में भी अधिकांश साल में केवल एक भुगतान वाला काम करते हैं। इससे पता चलता है कि क्रिएटर बनना और क्रिएटर के रूप में स्थायी आय बनाना दो अलग चरण हैं।

आय की तुलना भी इसी संदर्भ में करनी होगी। रिपोर्ट के अनुसार 1,000 से 10,000 अनुयायियों वाला नैनो क्रिएटर यदि साल में दो अभियान करता है, तो उसकी अनुमानित कमाई औसत ग्रामीण वेतनभोगी आय की लगभग 29% और औसत शहरी वेतनभोगी आय की लगभग 20% के बराबर होती है। 10,000 से 100,000 अनुयायियों वाला माइक्रो क्रिएटर यदि साल में पाँच अभियान करे, तभी वह पूर्णकालिक वेतन के स्थानीय मानकों के करीब पहुँचता है।

इसलिए केवल अनुयायियों की संख्या को आय का प्रमाण मानना भ्रामक होगा। किसी क्रिएटर की आर्थिक स्थिति समझने के लिए अभियान की आवृत्ति, भुगतान का आकार, उत्पादन लागत, कर, एजेंसी या मंच की फीस और आय के अन्य स्रोत भी देखने होंगे। रिपोर्ट स्वयं जोर देती है कि क्रिएटर आय की तुलना स्थानीय श्रम बाजार के विकल्पों से की जानी चाहिए, न कि केवल महानगरों के वेतन से।

ब्रांडों के लिए संकेत: एकबारगी प्रचार से आगे

ब्रांड गतिविधि में भी विस्तार हुआ है। वार्षिक क्रिएटर अभियानों की संख्या 2020 के लगभग 14,000 से बढ़कर 2025 में 42,000 हुई, जबकि प्रति अभियान औसत खर्च 3.6 गुना बढ़ा। इन आंकड़ों से यह संकेत मिलता है कि क्रिएटर मार्केटिंग अब केवल प्रयोगात्मक माध्यम नहीं रही, लेकिन इससे हर अभियान के अच्छे परिणाम या हर क्रिएटर की स्थायी आय सिद्ध नहीं होती।

रिपोर्ट का व्यावहारिक निष्कर्ष यह है कि कंपनियों को महानगरों के कुछ बड़े नामों पर पूरा बजट केंद्रित करने के बजाय क्षेत्र, भाषा और क्रिएटर स्तर के संतुलित समूह बनाने होंगे। दीर्घकालिक साझेदारी एकबारगी पोस्ट से अधिक उपयोगी हो सकती है, क्योंकि इससे ब्रांड को लगातार संदेश, दर्शक-समझ और प्रदर्शन की तुलना मिलती है। फिर भी, यह रिपोर्ट की सिफारिश है, गारंटीकृत व्यावसायिक परिणाम नहीं।

गैर-मेट्रो बाजारों को केवल सस्ता विकल्प समझना भी गलती होगी। स्थानीय क्रिएटर किसी भाषा या समुदाय में अधिक विश्वसनीय हो सकता है, पर चयन करते समय दर्शक-स्थान, विषय-संगति, वास्तविक भागीदारी, सामग्री की गुणवत्ता और भुगतान की शर्तों की जांच जरूरी रहेगी। बड़ी पहुंच और मजबूत स्थानीय प्रभाव हमेशा एक ही क्रिएटर में नहीं मिलते।

अभी क्या स्पष्ट नहीं है

रिपोर्ट 2020–2025 की अवधि पर आधारित है, इसलिए 2026 के पूरे वर्ष की कमाई, मंच-वार बदलाव या नए नियमों का प्रभाव इसमें शामिल नहीं माना जा सकता। इसके आंकड़े Qoruz के क्रिएटर और अभियान डेटाबेस, घरेलू खर्च, श्रम बाजार तथा दूरसंचार संबंधी स्रोतों को जोड़ते हैं; इसलिए “कुल क्रिएटर” की परिभाषा हर मंच पर मौजूद हर व्यक्ति के बराबर नहीं समझी जानी चाहिए।

अगला प्रश्न यह है कि क्या गैर-मेट्रो भागीदारी दोहराए जाने वाले भुगतान वाले काम में बदलती है। रिपोर्ट के अनुसार आगे की वृद्धि के लिए मंचों को खोज और मिलान बेहतर करना, ब्रांडों को नियमित साझेदारी बनाना और क्षेत्रीय भाषा बाजारों में कमाई के अवसर बढ़ाना होगा। 26 जुलाई 2026 तक उपलब्ध जानकारी में दिशा स्पष्ट है: भारत की क्रिएटर अर्थव्यवस्था अब महानगर-केंद्रित नहीं रही, लेकिन उसका अगला परीक्षण संख्या बढ़ाना नहीं, बल्कि भागीदारी को टिकाऊ आर्थिक अवसर में बदलना है।

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