GSAT-7C पर ₹2,563 करोड़—वायुसेना को सुरक्षित संचार मिलेगा

|लेखक: QUASA संपादकीय टीम|5 मिनट पढ़ने का समय
GSAT-7C पर ₹2,563 करोड़—वायुसेना को सुरक्षित संचार मिलेगा

रक्षा मंत्रालय की 15 अक्टूबर 2026 की विज्ञप्ति के अनुसार नई दिल्ली में भारतीय वायुसेना के GSAT-7C संचार उपग्रह क्षमता के लिए बेंगलुरु स्थित New Space India Limited (NSIL) के साथ ₹2,563 करोड़ का अनुबंध हुआ; उसी दिन नौसेना के Varunastra टॉरपीडो के लिए Bharat Dynamics Limited से ₹1,543 करोड़ का अलग अनुबंध हुआ और दोनों की घोषित कुल रकम लगभग ₹4,106 करोड़ थी। वायुसेना की परिसंपत्तियों के बीच सुरक्षित, बाधाओं के बीच कायम रहने वाला और निर्बाध संपर्क विकसित करना उपग्रह अनुबंध का घोषित लक्ष्य है। अभी पुष्टि अनुबंध पर हस्ताक्षर की है, उपग्रह के सेवा में आने की नहीं।

The Tribune की रक्षा रिपोर्ट के अनुसार वायुसेना अब तक सेना और नौसेना के साथ दूसरे उपग्रहों पर ट्रांसपोंडर क्षमता साझा करती रही है और समर्पित उपग्रह से विमानों तथा जमीनी कमान के बीच संपर्क बेहतर होने की अपेक्षा है। इस अनुबंध का महत्व वायुसेना की संचार जरूरतों के लिए अलग क्षमता बनाने में है। विमान और जमीन पर स्थित इकाइयों के बीच सूचना पहुंचाना उस क्षमता का अहम उपयोग होगा।

संयुक्त रक्षा घोषणा में उपग्रह की रकम

बड़ी घोषित रकम में दो अलग सेनाओं के लिए दो अलग खरीद शामिल हैं। वायुसेना वाला समझौता उपग्रह संचार क्षमता का है, जबकि नौसेना वाला समझौता जहाज से छोड़े जाने वाले पनडुब्बी रोधी टॉरपीडो का है। दोनों को जोड़कर निकला कुल खर्च GSAT-7C का मूल्य बताने के लिए इस्तेमाल नहीं किया जा सकता। खरीद का उद्देश्य, उपयोगकर्ता और अनुबंध पक्ष भी अलग हैं; इन्हें एक ही अंतरिक्ष परियोजना का बजट मानने से उपग्रह पर होने वाला खर्च वास्तविक अनुबंध से बड़ा दिखाई देगा।

उपग्रह के हिस्से की घोषित रकम का अर्थ भी स्पष्ट रखना जरूरी है। यह रक्षा मंत्रालय और NSIL के बीच बताई गई अनुबंध राशि है, केवल अंतरिक्ष यान के निर्माण की अलग कीमत नहीं। घोषणा में उपग्रह, प्रक्षेपण और जमीनी ढांचे की मदवार लागत नहीं दी गई है। इस कारण अनुबंध राशि से किसी एक घटक का बिल या केवल उपग्रह यान की कीमत निकालना संभव नहीं है। उपलब्ध आंकड़ा पूरे हस्ताक्षरित समझौते का मूल्य बताता है।

वायुसेना को किस तरह का संपर्क मिलना है

GSAT-7C को वायुसेना की परिसंपत्तियों के लिए समर्पित संचार क्षमता के रूप में रखा गया है। घोषित लक्ष्य में सुरक्षित संपर्क संवेदनशील सैन्य सूचना की रक्षा से जुड़ा है, जबकि बाधाओं के बीच कायम रहने और निर्बाध संपर्क का उद्देश्य अलग-अलग परिसंपत्तियों के बीच संचार बनाए रखना है। ये परियोजना के अपेक्षित गुण हैं। वास्तविक क्षमता का आकलन उपग्रह और उससे जुड़ी व्यवस्था के सेवा में आने पर ही किया जा सकेगा।

विमानों और जमीनी कमान के बीच सूचना पहुंचने में सुधार की अपेक्षा इस समर्पित व्यवस्था से जुड़ी है। साझा ट्रांसपोंडर उपयोग की तुलना में अपनी क्षमता वायुसेना को अपनी जरूरतों के अनुसार संपर्क व्यवस्था बनाने का अवसर दे सकती है। कितना अतिरिक्त संचार भार संभाला जा सकेगा, संपर्क किन क्षेत्रों में उपलब्ध होगा और कौन-सी इकाइयां पहले जुड़ेंगी, इसकी जानकारी सार्वजनिक अनुबंध घोषणा में नहीं है। इसलिए अभी किसी तय गति या कवरेज को इस खरीद का सुनिश्चित परिणाम कहना जल्दबाजी होगी।

पहली मंजूरी और हस्ताक्षरित अनुबंध का अंतर

रक्षा अधिग्रहण परिषद की 23 नवंबर 2021 की स्वीकृति ₹2,236 करोड़ के खरीद प्रस्ताव के लिए थी, जिसमें GSAT-7C और ग्राउंड हब के जरिए सॉफ्टवेयर परिभाषित रेडियो को वास्तविक समय में जोड़ने की परिकल्पना थी। उस योजना में सीधे दिखाई देने की सीमा से परे सुरक्षित संपर्क तथा उपग्रह का भारत में डिजाइन, विकास और प्रक्षेपण भी शामिल था। वह खरीद की आवश्यकता को मिली मंजूरी थी, अंतिम हस्ताक्षरित अनुबंध नहीं।

पहली स्वीकृति से मौजूदा समझौते तक खरीद का चरण बदला है। पुराने प्रस्ताव में जमीनी हब का स्पष्ट उल्लेख था, लेकिन नई घोषणा खर्च का ऐसा विभाजन नहीं देती जिससे दोनों रकमों का समान दायरे में मिलान हो सके। अंतर को केवल उपग्रह महंगा होने का प्रमाण कहना इसलिए अनुचित होगा। यह भी स्पष्ट नहीं है कि पहले प्रस्तावित प्रत्येक जमीनी घटक नए समझौते में किस रूप में शामिल है। दोनों आंकड़ों को सीधे घटाकर निर्माण लागत में बढ़ोतरी निकालना उपलब्ध जानकारी से संभव नहीं है।

NSIL की भूमिका और सेवा शुरू होने का सवाल

NSIL उपग्रह क्षमता के लिए रक्षा मंत्रालय का अनुबंध पक्ष है। उपग्रह को भारत में डिजाइन, विकसित और निर्मित करने की योजना है, लेकिन सार्वजनिक घोषणा किसी विशेष निर्माण इकाई या उपठेकेदार का नाम नहीं देती। निर्माता के सवाल पर यही अंतर अहम है: समझौता NSIL से हुआ है, जबकि उपग्रह बनाने का संस्थागत बंटवारा सार्वजनिक रूप से नहीं बताया गया। अनुबंध पक्ष के नाम को किसी अघोषित कारखाने या तकनीकी साझेदार की पहचान नहीं मानना चाहिए।

समझौते में बताई गई क्षमता और वायुसेना को उपलब्ध सेवा के बीच अभी निर्माण तथा परिचालन के चरण बाकी हैं। घोषित जानकारी में प्रक्षेपण की तारीख, सेवा शुरू होने की तारीख या वायुसेना को क्षमता सौंपने का कार्यक्रम नहीं दिया गया। अगला ठोस विकास इनमें से किसी समयरेखा का सामने आना होगा। उससे यह स्पष्ट हो सकेगा कि साझा ट्रांसपोंडर व्यवस्था से समर्पित संपर्क की ओर बदलाव कब शुरू हो सकता है।

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