YouTube Shorts या लंबे वीडियो: 1,000 व्यू की कमाई बराबर नहीं

|लेखक: QUASA संपादकीय टीम|7 मिनट पढ़ने का समय
YouTube Shorts या लंबे वीडियो: 1,000 व्यू की कमाई बराबर नहीं

बराबर 1,000 व्यू पर YouTube Shorts और लंबे वीडियो की कमाई आम तौर पर अलग होती है: AIR Media-Tech के 274 चैनलों के विश्लेषण में अधिकांश विषयों में Shorts का आरपीएम लंबे वीडियो के आरपीएम का लगभग 3% से 14% था, जबकि संगीत श्रेणी में यह अनुपात 41% से 60% तक पहुँचा। ये प्रकाशित नमूने के आँकड़े हैं, किसी भारतीय चैनल के लिए तय भुगतान दर नहीं।

अंतर की एक वजह राजस्व बाँटने का तरीका है। YouTube के साझेदार आय नियमों के तहत पात्र क्रिएटर को वॉच पेज के विज्ञापनों की शुद्ध आय का 55% मिलता है, लेकिन Shorts में उसे साझा क्रिएटर पूल से आवंटित राशि का 45% मिलता है। ये प्रतिशत अलग आधार पर लगते हैं, इसलिए इनके बीच का अंतर निकालकर प्रति व्यू कमाई नहीं बताई जा सकती।

विज्ञापन आय दोनों प्रारूपों में कैसे बँटती है

लंबे वीडियो की विज्ञापन आय उसके वॉच पेज पर दिखाए गए विज्ञापनों से जुड़ती है। एक वीडियो में विज्ञापन के कई अवसर हो सकते हैं, लेकिन हर दर्शक को विज्ञापन दिखे, यह ज़रूरी नहीं। विज्ञापन की उपलब्धता और दर्शक के देश जैसे कारणों से समान व्यू वाले लंबे वीडियो भी अलग रकम कमा सकते हैं।

Shorts फ़ीड में विज्ञापन क्लिपों के बीच आते हैं। YouTube की Shorts आय नीति के अनुसार इस आय से संगीत लाइसेंस का हिस्सा अलग कर क्रिएटर पूल बनाया जाता है; फिर प्रत्येक देश में पात्र, सक्रिय व्यू की हिस्सेदारी के आधार पर क्रिएटर को राशि आवंटित होती है। उस आवंटन पर क्रिएटर की हिस्सेदारी लागू होती है। इसलिए किसी एक Short के व्यू को उसके पास किसी खास विज्ञापन से पहुँची रकम नहीं माना जा सकता।

संगीत का असर पूल बनते समय पड़ता है। यदि किसी Short में संगीत है, तो उससे जुड़ी आय का कुछ हिस्सा संगीत अधिकारों के लिए रखा जा सकता है। लेकिन पूल से क्रिएटर को आवंटन तय करते समय उसके पात्र व्यू गिने जाते हैं; केवल संगीत जोड़ने से उसकी व्यक्तिगत हिस्सेदारी की दर नहीं बदलती। संगीत अधिकार रखने वाले चैनल को Content ID से मिलने वाली आय अलग रास्ता भी दे सकती है।

आरपीएम से क्या समझें, और क्या अलग रखें

YouTube की राजस्व माप की व्याख्या के अनुसार आरपीएम प्रति 1,000 व्यू पर क्रिएटर की आय दिखाता है। इसमें विज्ञापन के अलावा मंच पर मिलने वाली दूसरी आय भी शामिल हो सकती है; Shorts के लिए गणना सक्रिय व्यू पर होती है। सीपीएम विज्ञापनदाता की ओर से विज्ञापन पर खर्च का माप है, इसलिए उसे क्रिएटर के खाते में पहुँची रकम समझना गलत होगा। सीपीएम और आरपीएम का अंतर इसी तुलना में काम आता है।

दोनों प्रारूपों की प्रत्यक्ष आय तौलने के लिए एक ही अवधि के आँकड़े लें और देखें कि हर प्रारूप के व्यू के बदले कितनी आय आई। पूरे चैनल का मिला-जुला आरपीएम यहाँ पर्याप्त नहीं है: उसमें Shorts के अधिक व्यू जुड़ने पर दर नीचे दिख सकती है, भले लंबे वीडियो की अपनी आय स्थिर हो। विज्ञापन आय, सदस्यता और दूसरे मंचीय स्रोतों को अलग देखने से बदलाव की वजह साफ़ होती है।

एक काल्पनिक उदाहरण लें। यदि लंबे वीडियो का आरपीएम ₹100 और Shorts का ₹5 हो, तो लंबे वीडियो के एक हज़ार व्यू जितनी प्रत्यक्ष आय के लिए Shorts को बीस हज़ार व्यू चाहिए। हिसाब लंबे वीडियो के आरपीएम को Shorts के आरपीएम से भाग देकर, फिर एक हज़ार से गुणा करके निकलता है। ये रकम भारत में YouTube की वास्तविक दरें नहीं हैं; उदाहरण सिर्फ बताता है कि बराबर व्यू को बराबर आर्थिक परिणाम क्यों नहीं मान सकते।

विषय, दर्शक का देश और संगीत क्यों मायने रखते हैं

प्रकाशित आरपीएम को भारतीय कमाई का अनुमान बनाने से पहले दर्शकों की जगह देखनी होगी। विज्ञापनदाताओं की माँग और विज्ञापन की दर देश के अनुसार बदलती है। भारत में रहने वाला क्रिएटर भी कई देशों से व्यू पा सकता है; उसकी आय पर दर्शकों का यह मिश्रण असर डालेगा। किसी दूसरे देश के चैनल की डॉलर में बताई गई दर को रुपये में बदलना उसके अपने चैनल की संभावित आय नहीं बताता।

विषय का फर्क भी उसी तरह महत्वपूर्ण है। दर्शकों का व्यवहार, विज्ञापन के अवसर और आय के दूसरे स्रोत एक संगीत चैनल, गेमिंग चैनल और शिक्षण चैनल में समान नहीं होंगे। खास तौर पर संगीत अधिकार रखने वाले चैनल की Shorts आय को साधारण फ़ीड विज्ञापन हिस्से के बराबर रखकर देखना भ्रामक हो सकता है। प्रकाशित संगीत श्रेणी का ऊँचा अनुपात हर ऐसे क्रिएटर पर लागू नहीं होता जो अपने वीडियो में किसी और का गीत इस्तेमाल करता है।

इसलिए नमूने की सीमा निर्णय का हिस्सा है। AIR Media-Tech के आँकड़े उसके उपलब्ध चैनलों और उनके दर्शकों से आते हैं; वे भारत के सभी चैनलों का प्रतिनिधि सर्वेक्षण नहीं हैं। उन्हें कमाई के अंतर का पैमाना मानना उपयोगी है, लेकिन किसी नए चैनल के लिए आय का वादा मानना नहीं। प्रायोजन से सीधे मिला भुगतान भी मंच पर दिखने वाले आरपीएम से अलग रखना चाहिए।

Shorts शुरू करने के बाद लंबे वीडियो पर क्या दिखा

250 क्रिएटरों के प्रेक्षणात्मक अध्ययन में उनके पहले Shorts प्रकाशन से पहले और बाद के लंबे वीडियो की तुलना करने पर व्यू में सांख्यिकीय रूप से महत्वपूर्ण गिरावट मिली। पूरे नमूने में लाइक और टिप्पणियों की गिरावट उसी स्तर पर स्थापित नहीं हुई। अध्ययन ने क्रिएटरों के प्रकाशित वीडियो देखे थे; इससे यह साबित नहीं होता कि Shorts ने ही लंबे वीडियो के व्यू घटाए।

यह अंतर प्रारूप मिश्रण के लिए महत्वपूर्ण है। Shorts नए दर्शकों तक पहुँच सकते हैं, लेकिन छोटे वीडियो का व्यू यह नहीं बताता कि वही व्यक्ति बाद में लंबा वीडियो भी देखेगा। दूसरी ओर, लंबे वीडियो के मासिक कुल व्यू घटें तो प्रकाशित लंबे वीडियो की संख्या भी देखनी होगी। कम वीडियो आने पर कुल व्यू घटना अपने आप दर्शकों के हटने का प्रमाण नहीं बनता।

आर्थिक असर में तीन चीज़ें साथ आती हैं: Shorts की अपनी आय, उनसे लंबे वीडियो तक पहुँचे दर्शकों से मिली आय, और इसी दौरान लंबे वीडियो की पहुँच में बदलाव। YouTube का संबंधित वीडियो लिंक दर्शक को Short से दूसरे वीडियो तक जाने का रास्ता दे सकता है। रास्ता उपलब्ध होना और दर्शक का वास्तव में वहाँ पहुँचना अलग परिणाम हैं।

प्रारूप मिश्रण का आर्थिक फैसला

यदि मुख्य लक्ष्य मंच से मिलने वाली प्रत्यक्ष आय है, तो दोनों प्रारूपों के अलग आरपीएम के साथ उन्हें बनाने में लगा समय भी तौलें। बहुत अधिक Shorts व्यू कम आय दे सकते हैं, फिर भी उन्हें बनाने में काम लगता है। यदि लक्ष्य नए दर्शक पाना है, तो Shorts के व्यू के साथ उन लंबे वीडियो की पहुँच देखें जिनसे उनका विषय जुड़ा है। केवल चैनल के कुल व्यू बढ़ने से मिश्रण की सफलता तय नहीं होती।

तुलना एक ही अवधि और मिलते-जुलते विषय के वीडियो पर अधिक अर्थपूर्ण होगी। Shorts से आई आय और उनसे जुड़े लंबे वीडियो की अतिरिक्त आय को अलग पहचानें; लंबे वीडियो की अपनी आय और प्रति वीडियो व्यू भी साथ रखें। इस तरह दिखे बदलाव को Shorts का सिद्ध कारण न मानें, क्योंकि विषय, प्रकाशन की आवृत्ति और दर्शकों का मिश्रण भी बदल सकता है।

जहाँ Shorts दर्शक लाते हैं और लंबे वीडियो की आय बनी रहती है या बढ़ती है, वहाँ कम प्रत्यक्ष Shorts आरपीएम के बावजूद दोनों प्रारूप साथ काम कर सकते हैं। जहाँ कुल व्यू बढ़ते हैं लेकिन लंबे वीडियो की पहुँच और समग्र आय घटती है, वहाँ अधिक Shorts प्रकाशित करना अपने आप बेहतर विकल्प नहीं बनता। अनुपात का फैसला व्यू की एक संख्या से नहीं, दर्शक कहाँ से आते हैं और किस प्रारूप पर आय पैदा करते हैं, इससे निकलता है।

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