
IMC 2026 में साइबर धोखाधड़ी पर वैश्विक ढाँगे की माँग—AI ने जोखिम बढ़ाया

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 8 अक्टूबर 2026 को नई दिल्ली के यशोभूमि में IMC 2026 के उद्घाटन पर साइबर धोखाधड़ी और डीपफेक से निपटने के वैश्विक ढाँचे की माँग की, सरकारों, तकनीकी कंपनियों, दूरसंचार संचालकों और वित्तीय संस्थानों से साथ आने को कहा और चुनौती को इन शब्दों में रखा: “डीप-फेक्स कितनी बड़ी चुनौती बन चुकी है”। यह सहयोग की अपील है; साझा नियम और उन्हें लागू करने की प्रक्रिया अभी तय नहीं हुई है।
भारत सरकार के उद्घाटन विवरण के अनुसार, 8 अक्टूबर 2026 को शुरू हुए IMC 2026 में ‘सुरक्षा’ का स्तंभ भरोसेमंद और टिकाऊ डिजिटल नेटवर्क पर केंद्रित है। दूरसंचार विभाग और सेल्युलर ऑपरेटर्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया के इस आयोजन में सरकारी प्रदर्शनी ने संचार साथी तथा वित्तीय धोखाधड़ी जोखिम संकेतक जैसी मौजूदा पहलों को भी दिखाया। वैश्विक ढाँचे की माँग इन घरेलू प्रयासों से आगे, कई देशों और सेवाओं के बीच तालमेल की है।
सीमा पार धोखाधड़ी ने साझा व्यवस्था की माँग क्यों उठाई
एक देश में बैठा अपराधी दूसरे देश की सेवाओं का इस्तेमाल करके तीसरे देश में किसी व्यक्ति को निशाना बना सकता है। ऐसी स्थिति में संदिग्ध कॉल की शुरुआत, संदेश भेजने वाला मंच, भुगतान की सेवा और प्रभावित व्यक्ति अलग-अलग अधिकार क्षेत्रों में हो सकते हैं। किसी एक संस्था के पास पूरी घटना की जानकारी अपने आप नहीं पहुँचती। धोखाधड़ी लोगों तक पहुँचने से पहले रोकनी हो तो इन संस्थाओं के बीच समय पर सहयोग जरूरी होगा।
इस सहयोग का पहला कठिन हिस्सा पहचान है: कॉल या संदेश का स्रोत किसने सत्यापित किया और उस सत्यापन पर दूसरी सेवा कितना भरोसा कर सकती है? दूसरा हिस्सा प्रमाण है: एक देश में मिला संदिग्ध संकेत दूसरे देश के दूरसंचार संचालक या वित्तीय संस्था तक किस रूप में पहुँचे, ताकि उस पर समय रहते कार्रवाई हो सके? तीसरा हिस्सा जिम्मेदारी है। यदि संपर्क, नकली सामग्री और भुगतान अलग-अलग मंचों से गुजरते हैं, तो हस्तक्षेप का निर्णय और उसका रिकॉर्ड किसके पास रहेगा?
GSMA और दुनिया भर के दूरसंचार संचालकों से धोखाधड़ी लोगों तक पहुँचने से पहले रोकने वाला तंत्र बनाने की अपील नेटवर्क स्तर पर जल्दी पहचान और कार्रवाई की अपेक्षा दिखाती है। किसी एक तकनीकी पद्धति को अनिवार्य नहीं बनाया गया है। प्रस्ताव को वास्तविक व्यवस्था में बदलने के लिए भागीदारों को सूचना साझा करने, प्रमाण सुरक्षित रखने और विभिन्न देशों के नियमों के साथ काम करने की प्रक्रिया तय करनी होगी।
AI ने हमले की गति और पहचान की चुनौती कैसे बढ़ाई
डीपफेक भरोसेमंद व्यक्ति की आवाज़ या छवि का आभास पैदा कर सकता है। जब ऐसा संपर्क किसी भुगतान या निजी जानकारी की माँग से जुड़ता है, तो प्राप्तकर्ता के लिए असली पहचान का सवाल तत्काल हो जाता है। नागरिक के सामने तीन सवाल एक साथ आते हैं: कॉल करने वाला कौन है, संदेश असली है या नहीं, और भुगतान तथा डेटा सुरक्षित रहेंगे या नहीं। वैश्विक ढाँचे की माँग इसी भरोसे को सीमा पार संचार में मजबूत करने से जुड़ी है।
बिजनेस स्टैंडर्ड से बातचीत में Fortinet India के अंतरिम प्रमुख कौस्तुभ देशमुख ने कहा कि AI की मदद से हमले तैयार करने, बदलने और उनका इस्तेमाल करने का समय मिनटों तक सिमट सकता है; सम्मेलन में कंपनी ने हमले और बचाव के अनुकरण भी दिखाए, जिनमें शून्य-भरोसा सुरक्षा शामिल थी। यह हमलों की संभावित रफ्तार पर उद्योग का आकलन और प्रदर्शनी का विवरण है, किसी देश में हुई धोखाधड़ी का मापा गया परिणाम नहीं।
तेजी का असर केवल नकली सामग्री बनाने तक सीमित नहीं रहता। कोई भ्रामक संदेश बदला जाए, नए संपर्क मार्ग से भेजा जाए और फिर भुगतान की ओर ले जाए, तो अलग-अलग सेवाओं को प्रतिक्रिया के लिए कम समय मिलता है। यही कारण है कि केवल सामग्री हटाने से पूरी घटना का पता नहीं चलता; संपर्क का स्रोत, खाते की पहचान और भुगतान से जुड़े संकेत भी महत्वपूर्ण होते हैं। ये संभावित सुरक्षा जरूरतें हैं, सम्मेलन में स्वीकृत वैश्विक नियमों की सूची नहीं।
AI प्रणालियों में शून्य भरोसा कहाँ जरूरी होता है
उद्योग की शून्य-भरोसा दलील उस क्षण पर लागू होती है जब कोई उपयोगकर्ता या स्वचालित प्रणाली नेटवर्क के भीतर होकर दूसरे संसाधन तक पहुँच माँगती है। भीतर मौजूद होना अपने आप अधिकार का प्रमाण नहीं है। AI प्रणाली को कंपनी के डेटा, दूसरे अनुप्रयोग या किसी कार्रवाई तक पहुँच मिली हो, तो उसकी पहचान और उस खास काम की अनुमति जाँचना जरूरी होता है। इससे एक प्रभावित खाते या गलत निर्देश को आगे फैलने से रोकने में मदद मिल सकती है।
दूरसंचार के अधिक स्वचालित होने पर यह प्रश्न और ठोस हो जाता है। एक प्रणाली संकेत पहचान सकती है, दूसरी उसे किसी खाते से जोड़ सकती है और तीसरी सेवा प्रतिक्रिया दे सकती है। यदि इन चरणों में अधिकार स्पष्ट न हों, तो सुरक्षा के लिए लगाया गया स्वचालन भी गलत कार्रवाई का रास्ता खोल सकता है। शून्य भरोसे का व्यावहारिक अर्थ हर चरण पर उचित अनुमति, सीमित पहुँच और कार्रवाई का पता लगाने योग्य रिकॉर्ड है।
AI से संदिग्ध गतिविधि पहचानने और AI प्रणाली को स्वयं सुरक्षित रखने के काम जुड़े हुए हैं, पर उनके नियंत्रण अलग हैं। पहले काम में असामान्य संपर्क या व्यवहार का संकेत खोजना पड़ता है। दूसरे में यह सुनिश्चित करना पड़ता है कि संकेत पर काम करने वाली प्रणाली केवल अनुमत डेटा देखे और तय सीमा में ही कार्रवाई करे। सम्मेलन की चर्चा ने इसी दोहरी जरूरत को सामने रखा; किसी एक प्रदर्शनी से इन नियंत्रणों की व्यापक प्रभावशीलता सिद्ध नहीं होती।
नागरिकों, कंपनियों और नीति-निर्माताओं पर अलग असर
नागरिक के लिए सबसे सीधा प्रश्न कॉल और संदेश की प्रामाणिकता तथा भुगतान की सुरक्षा है। वैश्विक व्यवस्था बनती है तो उसके उपयोगी होने का पैमाना यह होगा कि संदिग्ध संपर्क की जानकारी संबंधित सेवाओं तक इतनी जल्दी पहुँचे कि नुकसान रोका जा सके। फिलहाल उद्घाटन भाषण से किसी नए उपभोक्ता अधिकार या तत्काल उपलब्ध सुरक्षा सुविधा की घोषणा नहीं निकलती। सहयोग की माँग और लागू संरक्षण के बीच कई संस्थागत निर्णय आने हैं।
कंपनियों के लिए मुद्दा अपने पहचान नियंत्रण को नेटवर्क, डेटा और भुगतान की प्रक्रियाओं से जोड़ना है; नीति-निर्माताओं के लिए देशों के बीच प्रमाण और जिम्मेदारी के नियम तय करना। अगला ठोस संकेत किसी लिखित प्रस्ताव, भागीदारों की सहमति या संयुक्त परीक्षण से मिलेगा। तब स्पष्ट होगा कि सीमा पार धोखाधड़ी के साझा तंत्र में किस संस्था को किस चरण पर कार्रवाई करनी होगी।
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