बच्चों के सोशल मीडिया खाते पर सवाल—Supreme Court ने जवाब मांगा

Supreme Court ने 10 सितंबर 2026 को बच्चों के सोशल मीडिया और दूसरे डिजिटल मंचों के उपयोग पर सुरक्षा उपाय मांगने वाली जनहित याचिका में केंद्र सरकार को नोटिस दिया। Bar & Bench की रिपोर्ट के मुताबिक, याचिका 18 वर्ष से कम उम्र के बच्चों को ऑनलाइन शोषण और अन्य जोखिमों से बचाने के उपाय चाहती है।
10 सितंबर की कार्यवाही से बच्चों के खातों पर कोई नया आयु-प्रतिबंध या अभिभावकीय सहमति का नियम लागू नहीं हुआ। अदालत ने केंद्र से जवाब मांगा है; उसने मौजूदा खाते बंद करने या किसी निश्चित उम्र से कम बच्चों को सोशल मीडिया से रोकने का अंतिम निर्देश नहीं दिया।
अदालत ने अभी केवल जवाब मांगा है

मामले की सुनवाई भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना की पीठ ने की। The Indian Express के सुनवाई विवरण के अनुसार, पीठ ने संबंधित केंद्रीय मंत्रालयों से जवाब मांगा और मौखिक रूप से कहा कि भारत में बच्चों के लिए कुछ सुरक्षा उपायों की आवश्यकता है।
नोटिस सरकार को याचिका पर अपना पक्ष रखने का अवसर देता है। इससे याचिका की मांगें अदालत का आदेश नहीं बन जातीं। सुनवाई के दौरान सुरक्षा उपायों या अवरोधों की जरूरत पर की गई मौखिक टिप्पणियां भी अपने-आप सोशल मीडिया मंचों के लिए लागू नियम नहीं हैं।
मौजूदा स्थिति को तीन अलग हिस्सों में समझना चाहिए:
- अदालत की कार्रवाई: केंद्र को नोटिस देकर जवाब मांगा गया है।
- याचिकाकर्ता की मांग: बच्चों के स्वतंत्र खातों, आयु-पुष्टि और अभिभावकीय नियंत्रण के लिए कड़े उपाय किए जाएं।
- तात्कालिक परिणाम: Supreme Court ने कोई नया देशव्यापी आयु-प्रतिबंध, खाता-निलंबन या अनिवार्य सत्यापन व्यवस्था लागू नहीं की है।
याचिका बच्चों के खातों में क्या बदलाव चाहती है

जनहित याचिका Just Rights for Children Alliance ने दायर की है। उसका कहना है कि बच्चे सोशल मीडिया, ऑनलाइन खेल और अन्य डिजिटल सेवाओं पर स्वतंत्र खाते बनाते समय सेवा-शर्तें तथा गोपनीयता नीतियां स्वीकार करते हैं, लेकिन उनकी उम्र और कानूनी प्राधिकार की जांच के लिए एक समान प्रभावी व्यवस्था नहीं है।
LiveLaw के कार्यवाही विवरण के मुताबिक, याचिका केंद्र से ऐसे कदम चाहती है जिनसे नाबालिग अभिभावक या कानूनी संरक्षक की सहमति के बिना डिजिटल मंचों से समझौता न करें। इसमें अभिभावक या संरक्षक की पहचान ई-केवाईसी अथवा किसी अन्य कानूनी रूप से मान्य तरीके से जांचने और सूचना प्रौद्योगिकी नियमों में प्रावधान जोड़ने या अलग दिशानिर्देश बनाने की मांग भी है।
याचिका बच्चों को डिजिटल दुनिया से पूरी तरह बाहर रखने की मांग नहीं करती। उसका प्रस्ताव है कि शिक्षा, शोध, कौशल और परीक्षा की तैयारी जैसी सामग्री तक पहुंच अभिभावक या संरक्षक द्वारा संचालित व्यवस्था के माध्यम से बनी रह सकती है। स्वतंत्र बाल खाते रोकना, मौजूदा समझौतों को निलंबित करना और आयु-पुष्टि लागू करना फिलहाल याचिकाकर्ता के प्रस्ताव हैं—लागू न्यायिक निर्देश नहीं।
याचिका ऑनलाइन बहलावे, यौन शोषण, जबरन वसूली, साइबर उत्पीड़न, व्यवहारगत रूपरेखा तैयार किए जाने, निजी जानकारी के दुरुपयोग और उम्र के अनुपयुक्त सामग्री तक पहुंच जैसे जोखिमों का हवाला देती है। इन जोखिमों को आधार बनाकर मांगी गई व्यवस्था की आवश्यकता और उसका स्वरूप आगे सरकार के जवाब तथा अदालती विचार का विषय होगा। नोटिस को सभी आरोपों पर न्यायिक निष्कर्ष नहीं माना जा सकता।
अनुबंध-क्षमता का तर्क कहां से आता है

याचिका खाता बनाने की प्रक्रिया को अनुबंध से जोड़ती है: उपयोगकर्ता सेवा-शर्तें स्वीकार करता है और मंच के साथ अधिकारों तथा दायित्वों वाला संबंध बनता है। उसका केंद्रीय प्रश्न है कि जो बच्चा स्वतंत्र रूप से अनुबंध करने में सक्षम नहीं है, उसकी स्क्रीन पर दर्ज सहमति को मंच किस कानूनी आधार पर पर्याप्त मान सकता है।
भारतीय संविदा अधिनियम, 1872 की धारा 11 के अनुसार अनुबंध करने में वही व्यक्ति सक्षम है जो उस पर लागू कानून के तहत वयस्क हो, स्वस्थ मस्तिष्क का हो और किसी कानून द्वारा अयोग्य न ठहराया गया हो। याचिकाकर्ता इसी सामान्य कसौटी को डिजिटल मंचों की सेवा-शर्तों पर लागू करने और नाबालिगों से हुए ऐसे समझौतों को आरंभ से अमान्य मानने की मांग करता है।
धारा 11 का पाठ और उससे निकाला गया याचिकाकर्ता का प्रस्ताव अलग बातें हैं। यह धारा अनुबंध-क्षमता की कसौटी देती है, लेकिन सोशल मीडिया खाते की कोई न्यूनतम आयु, प्रत्येक बाल खाते का स्वतः निलंबन या अभिभावक की पहचान जांचने की तकनीकी प्रक्रिया तय नहीं करती। यह भी अभी निर्धारित नहीं हुआ है कि अलग-अलग डिजिटल सेवाओं और उनके उपयोग की प्रकृति पर याचिका का तर्क किस तरह लागू होगा।
अभिभावकों और मंच संचालकों के लिए क्या बदला
इस सुनवाई का तत्काल कानूनी परिणाम केंद्र से मांगा गया जवाब है। केवल नोटिस के कारण अभिभावकों को बच्चे का खाता बंद करने का नया निर्देश नहीं मिला और मंच संचालकों पर Supreme Court की ओर से कोई नई सार्वदेशिक न्यूनतम आयु, अनिवार्य अभिभावकीय अनुमति या ई-केवाईसी प्रक्रिया लागू नहीं हुई।
इसका अर्थ यह नहीं कि मंचों की मौजूदा आयु-शर्तें या पहले से लागू कानूनी दायित्व समाप्त हो गए हैं। प्रत्येक सेवा की वर्तमान नीति और लागू कानून पहले की तरह अलग से प्रभावी रहेंगे। संकीर्ण लेकिन महत्वपूर्ण निष्कर्ष यह है कि 10 सितंबर का नोटिस अपने-आप नया खाता नियम नहीं है।
कहानी का अगला निर्णायक चरण केंद्र का जवाब होगा। उससे पता चलेगा कि सरकार मौजूदा व्यवस्था को पर्याप्त मानती है या आयु-पुष्टि, अभिभावकीय सहमति और बच्चों के लिए विशेष सुरक्षा उपायों में बदलाव का प्रस्ताव रखती है। उसके बाद अदालत आगे निर्देश दे सकती है; अभी मामला विचाराधीन है और याचिका में मांगी गई पाबंदियां प्रस्ताव ही हैं।
हमारे न्यूज़लेटर की सदस्यता लें
Web3, AI और क्रिप्टो की नवीनतम खबरें सीधे अपने इनबॉक्स में पाएँ।